वैज्ञानिकों और नेताओं के लिए चुनौती : वाइरस की, महामारी की

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विचार – मंथन

जीवविज्ञान कहती है कि वाइरस एक ऐसी सूक्ष्मतम जैविक इकाई है जो अनुकूल वातावरण में सक्रिय रहती है और प्रतिकूल परिस्थितियों में निष्क्रिय हो जाती है, जहाँ कहीं भी वह है, वहीं पर पड़ी रहती है। यह बात अलग है कि हवा उड़ा ले जाय, पानी बहा ले जाय या किसी के चिपकने से कहीँ स्थानांतरित हो जाय।

अनुकूल परिस्थितियों में इसका एक ही काम होता है पोषित होकर विभाजित होना। विभाजन से जितने भी टुकड़े हुए उनमें से प्रत्येक ही एक वाइरस के रूप में विकसित होकर पुनः विभाजन के लिए तैयार हो जाता है। इस प्रकार ये बहुत तेजी से बहुत कम समय में ही बहुत ज्यादा संख्या में हो जाते हैं।

वाइरस का एक टुकड़ा विकसित होकर पुनः विभाजित होने तक के लिए आवश्यक ऊर्जा उस अनुकूल शरीर से प्राप्त करता है जिसमें वह मौजूद है। अतः वाइरस के जितने अधिक टुकड़े होंगे उतनी ही अधिक ऊर्जा भी रोगी के शरीर से लेंगे और उस अंग को भी क्षतिग्रस्त करेंगे जहाँ पर इन्हें अनुकूल वातावरण मिला है। जैसा कि अभी तक बताया जा रहा है कि कोविड-19 मानव के फेफड़ों को ही संक्रमित करता है। जब यह वाइरस मानव-फेफड़ों में ही अधिकांश रहता है तो स्वाभविक ही साँस, छींक, कफ, खराश के द्वारा फैलता होगा लेकिन सर्वाधिक सम्भावना मुझे तो साँस की लगती है और शायद इसीलिए “कोरोना”अन्य महामारियों की तुलना में कहीँ ज्यादा तेजी से फैल रहा है। खैर जो भी हो।

मैं इसे चुनौती के रूप में इसलिए देख रहा हूँ कि (1) जैसे कई जीवोँ के “कोकून” पहली-दूसरी बारिश में ही अनुकूल परिस्थितियाँ पाकर स्वतः टूट जाते हैं और उनमें से निकले जन्तु जमीन पर विचरण करने लगते हैं। इसी प्रकार यदि कहीँ पर भी पड़े निष्क्रिय कोविड-19 वाइरस भी सक्रिय हो उठे और वातावरण में हवा द्वारा फैल कर साँस द्वारा मानव शरीर में चले गए तो एकदम कितने लोग बीमार पड़ जाएँगे जो कि महाविकराल रूप हो सकता है। इसी प्रकार भारत में मलेरिया-सीजन लगभग 20 अगस्त से सितम्बर अन्त तक होता है। उस समय में अधिकांश लोग बुखार पीड़ित हो जाते हैं और दुर्बल शरीर पर सभी आक्रमण-संक्रमण सफल होते हैं। अतः उस समय भी महाविकराल रूप देखने को मिल सकता है।

(2) राजनीति की दृष्टि से देखें तो राज्य सरकारें अपने देश की केन्द्रीय सरकार से या किसी देश की सरकार अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अन्य देशों से कब तक आँकड़े छिपायेगी या गलत आँकड़े देगी ? जब मौतें होने लगेंगीं और जनता दहाड़ें मारने लगेगी, इलाज के लिए दवाइयाँ आदि व्यवस्थाओं की माँग बढ़ेगी, अन्य मानवोपयोगी वस्तुओं की माँग में कमी हो जायेगी तो कोई नासमझ भी आसानी से कह देगा कि जरूर कुछ गड़बड़ तो है लेकिन नेताओँ के द्वारा स्वीकार या प्रकट नहीँ की जा रही है। तब इन्हें स्वीकार करना ही होगा और सच्चाई को बताना ही पड़ेगा।

अतः देश के वैज्ञानिकों से भी मेरा निवेदन है कि आप “टीका और दवाइयाँ” तो विकसित करें ही लेकिन इस वाइरस के व्यवहार की उक्त सम्भावना पर भी अध्ययन कर सरकार को सूचित करदें ताकि समय रहते समुचित व्यवस्था की जा सके।

उस घातक पहली-दूसरी बारिश के लिए अभी लगभग एक-डेढ़ महीना है और मलेरिया-सीजन का भी लगभग साढ़े तीन-साढ़े चार महिनों का समय है, इतने समय में काफी संभल सकते हैं। फिर जैसी वैज्ञानिकों की क्षमताएं, सीमाएँ और नेताओँ की इच्छाशक्ति या राजनैतिक मजबूरियाँ हों वे जाने, लेकिन निश्चित रूप से यह चुनौती है इन्हीं दोनों के लिए।

बालमुकुन्द पोटर
रिटायर्ड प्रिंसीपल, अकलेरा