कभी विचार किया है आपने कि आखिर क्या है समाज और समाजसेवा के सही मायने?

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प्रजापति मंथन : झालावाड़। समाज और समाजसेवा कहने में तो बहुत छोटे शब्द है लेकिन उतना ही बड़ा इनका महत्व है। समाज का दायरा बहुत बड़ा है जिसकी शुरूआत घर से होती है लेकिन भाई बंधुओं, रिश्तेदारों से होकर इसका दायरा एक पुरे वर्ग तक पहुंच जाता है। एक वर्ग, जिसका अपना एक सिस्टम होता है, जिसकी अपनी मान्यताएं होती है, अपने नियम होते है। आज हर कोई किसी न किसी समाज की डोर से बंधा हुआ है। हां, यह बात अलग है कि कोई उस समाज रूपी डोर को माने या ना माने। लेकिन समाज के अस्तित्व को नकारा नहीं जा सकता है।

अब हम बात करते है समाजसेवा की। समाजसेवा शब्द का अर्थ स्वत: स्पष्ट है। यह शब्द समाज और सेवा दोनों से मिलकर बना है। जिसका सामान्य अर्थ है – समाज की सेवा करना। अब व्यक्ति समाज की किस प्रकार सेवा करता है इस पर मंथन करते है। सेवा शब्द का सामान्य अर्थ है किसी की सेवा करना, मदद करना, उसे पुष्ट करना आदि। व्यक्ति सेवा कई प्रकार से कर सकता है, जैसे आर्थिक रूप से, शारीरिक रूप से, बौद्धिक रूप से आदि।

आर्थिक रूप से सेवा का सीधा अर्थ है समाज के किसी कार्य के लिए धन का प्रबंध से है। जो वर्तमान में भी सभी समाजों में प्रचलित है और सभी इसी आर्थिक रूप के द्वारा समाजसेवा करते है। इसमें सभी अपनी-अपनी क्षमता के अनुसार सहयोग करते है अर्थात पूंजीपति ज्यादा सहयोग देते है और आर्थिक रूप से कमजोर व्यक्ति कम सहयोग। लेकिन फिर भी समाज के लिये होने वाला कार्य पूर्ण हो जाता है। क्योंकि सभी एक दूसरे के सहयोग की भावना को लेकर कार्य करते है।

शारीरिक रूप से सेवा में व्यक्ति स्वयं समाज के लिए कार्य करता है। अर्थात वह अपने निजी कार्यो को छोड़कर समाज के लिए निर्धारित कार्य को करने लगता है। यह उसका शारीरिक रूप से सेवा का प्रकार है। जो किसी कार्यक्रम के दौरान उस संस्था या संगठन के पदाधिकारियों के द्वारा उसकी तैयारियों के रूप में किया जाता है।

तीसरा आता है बौद्धिक सेवा। जिसका तात्पर्य समाज के बुद्धिजीवी वर्ग द्वारा समाज के हित के लिए बनायी गई योजना से है। क्योंकि बुद्धिजीवी वर्ग अपनी बुद्धि या ज्ञान का उपयोग समाज के हित में करते है। जो ज्ञान उन्होंने अर्जित किया है उसके माध्यम से समाज की सेवा करते है ताकि समाज उनके ज्ञान का उपयोग कर सके।

अब आप सोच रहें होंगे कि यह सब वर्गीकरण करके में क्या कहना चाह रहा हूँ? इससे क्या स्पष्ट होता है यह तो सभी जानते है कि किस प्रकार सेवा करते है?

हां, यह सभी जानते है। लेकिन आज में आपको यह समझाने का प्रयास करना चाह रहा हूँ कि क्या उपर बताये गये सभी सेवा के प्रकार अपना-अपना योगदान समाज को दें रहें है। जिससे समाज की सेवा हो सके। क्योंकि समाज की सेवा के लिए तीनों प्रकारों में तालमेल होना आवश्यक है। तीनों के बिना समाजसेवा पूर्ण कैसे हो सकती है। यह प्रश्न बहुत महत्वपूर्ण है। और इस पर आप सभी को एक बार जरूर सोचना होगा। क्योंकि अगर यह सही प्रकार से कार्य कर रहें है तो फिर आज समाजसेवा की इतनी दुर्दशा क्यों हो रही है? क्यों आज समाजसेवा के नाम से लोगों ने दूरी बना रखी है?

आज आर्थिक रूप से लोग समाजसेवा के नाम से मदद तो करते है लेकिन बड़े दुखी मन से। या मदद करेंगे तो किसी पद या मंच पर नाम बोलने की लालसा से। क्या हमारी ये लालसायें बहुत ज्यादा नहीं बड़ गई? शायद हमारी इन्ही लालसाओं ने हमें स्वार्थी तो नहीं बना दिया?

आज समाज से हर कोई उम्मीद तो करता है लेकिन समाज के लिए कोई कार्य नहीं करना चाहता। जो लोग समाज के लिए कार्य करते है तो उन्हें लोगों का सहयोग नहीं मिलता। जिनसे सहयोग मिलता है उनकी भी लम्बी-चौड़ी उम्मीदे होती है। कोई एक उम्मीद पुरी नहीं हुई तो व्यक्ति रूष्ट हो जाता है। अपनी इच्छा के अनुसार पद नहीं मिला तो व्यक्ति दुसरा संगठन बना लेता है और उसमें मनमर्जी का पद ले लेता है और स्वयं राष्ट्रीय अध्यक्ष या प्रदेश अध्यक्ष बन जाता है। क्या यही है हमारी समाजसेवा?

अब बात करते है सबसे महत्वपूर्ण बौद्धिक रूप से समाज सेवा की। जिसका तो वर्तमान में सबसे बुरा हाल है। आज समाज का बुद्धिजीवी वर्ग स्वयं को ज्ञानी मानकर घर की दहलीज को पार ही नहीं करना चाहता। यह वर्ग स्वयं को सर्वेसर्वा मानता है लेकिन किसी को कभी ट्रांसफर में, किसी धरना प्रदर्शन में जरूरत पड़ती है तो फिर समाज को कोसने लग जाता है। समाज की यह स्थिति हो गई? कोई मदद नहीं करता?

क्यों भाई, तुमने कभी समाज के लिए 1 दिन का समय नहीं निकाला, समाज के किसी कार्यक्रम में तुम्हे जाने का समय नहीं मिला, समाज की भलाई के लिए कभी नहीं सोंचा फिर आज किस हक से समाज को कोस रहे हो। यदि आपके पास समाज की सेवा करने का समय नहीं है तो समाज के पास भी आपके लिए समय नहीं है। इसमें किसी को भला-बुरा कहने की क्या बात है।

अरे…….. रूको हम कहां से कहां पहुंच गये…..। हम तो समाज और समाजसेवा पर विचार कर रहे थे। फिर इतने सारे प्रश्नों का अम्बार क्यों लगा दिया?

यह पश्नों का अम्बार नहीं, यह समाज की आज की हकीकत है। यह प्रश्न मेरे नहीं, समाज के हर उस व्यक्ति के है जो समाज के बारे में सोचता है और समाज की परवाह करता है, उसकी सेवा करना चाहता है। लेकिन समाज की इस स्थित के चलते कुछ कर नहीं पा रहा है।

तो क्या आज हमारी समाज सेवा केवल स्वार्थो पर आधारित हो गई है? क्या जिसमें हमारा फायदा होगा वही काम करेंगे, बाकी से कोई मतलब नहीं। क्या समाजसेवा कार्यक्रमों में आड़े-तिरछे फोटों खिंचवाकर सोशल मीडिया पर वाह-वाही लूटनें तक सीमित हो गई है?

मुझे तो ऐसा लगता है कि आज हम समाज और समाजसेवा के सही अर्थो को कोसों दूर छोड़ आयें है। हम अपनी भागदौड़ भरी जिंदगी में अपने फायदे के अलावा और कुछ देख ही नहीं पा रहें है। लेकिन अब हमें इन शब्दों के सही अर्थो को पुन: समझने की आवश्यकता है। हमें फिर से सोचना होगा कि हम कहां गलती कर रहें है, कहां सुधार की गुंजाईश है। तभी समाजसेवा को सही अर्थो में साकार कर पायेंगे।

प्रहलाद कुमार प्रजापति

संपादक, पाक्षिक प्रजापति मंथन