सब्र कर प्यारे … ये दिन भी गुजर जाऐंगे – पार्ट द्वितीय

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सब्र कर प्यारे ... ये दिन भी गुजर जाऐंगे
सब्र कर प्यारे ... ये दिन भी गुजर जाऐंगे

हर घ्र पहुँचे राशन पानी

राशन,सब्जी का अनावश्यक भंडारण न करते हुए, धैर्य से काम करने की जरूरत है। मेरे निजी मत और ज्ञान के अनुसार मंे इस आलेख के मूल भाव की ओर आपका ध्यान इंगित करते हुए कहना चाहुंगा कि जिस प्रकार से रोज कमाने खाने वालों के लिए लाकडाउन के दौरान अपना दाना पानी जुटाने के लिए आने वाली परेशानियां बार बार शासन प्रशासन और देश के बुध्दिजिवियों के लिए चिंता का बडा विषय बनकर उभरी है। ऐसें में यह सभी समस्याएं शासन पर ही थोपने की बजाय व्यक्ति को स्वयं भी इस समस्या का हल निकालने का प्रयास करना होगा। क्योकि वक्त बहुत नाजुक है। और समय का तकाजा रखते हुए अपने दैनिक खर्च का सीमित रखते हुए बहुत ही संयमित तथा मितव्ययता के साथ जीवन यापन करना जरूरी हो गया है।

जहा तक देखा जाएं तो रोटी,कपडा और मकान व्याक्ति की मूलभूत आवश्यकता है। जिसमे भी पहले जरूरी है दो वक्त की रोटी। लेकिन आज के समय में ऐसे परिवार जो दो वक्त की रोटी जुटाने में भी सक्षम नहीं है। उनकी मदद के लिए भी कई हाथ उठ रहै है। शहरी क्षैत्रों में प्रशासन के साथ ही कईं समाजसेवी संस्थाओ के माध्यम से अक्षम परिवारों तक भोजन पंहुचाने का कार्य बडी ही संजीदगी के साथ किया जा रहा है।

इसके अलावा अपने घर बार छोडकर दुर दराज रहकर काम करने वाले परिवार भी लाकडाउन के बाद जब अपने गंाव या शहर की ओर लोट रहै थे,तब भी रास्तें में भोजन पैकैट का वितरण आदि कार्य प्रशासन द्वारा किए गए। अब देखा जाएं तो हम अनुमान लगा सकतंे है कि ज्यादातर प्रवासी मजदुर परिवार अपने गन्तव्य तक पहुंच गए हांेगे। भारत की 70  फीसदी जनता गांवो में निवास करती है। और हम गर्व के साथ कह सकते है कि प्रत्येक भारतवासी उदार भाव का है।

सक्षम परिवार इस विषम परिस्थति में आगे आकर करे मदद

हम विषम परिस्थिति में अपने भाई बहनो की मदद के लिए खडे रहते है। गांवों में अनाज की मदद करने का चलन पुराने समय से है ही सही। गांव के परिवारो के घर में यदि खाने के गेंहु खत्म हो जाएं तो ज्यादा चिंता नहीं होती,क्योकि वहां लोग आसानी से इस तरह की मदद करते है। पर ऐसंे मंे भी आप (लेने वाले) मे भी विनम्रता के साथ ही देने वाले के प्रति कृतज्ञ भाव व्यक्त करना आपके समझदार होने की पहचान प्रदर्शित करेंगी।

कुल मिलाकर बात यह है कि  गांव या शहर दोनो जगहों पर दैनिक उपयोग की अति आवश्यक वस्तुओं की पर्याप्त उपलब्धता होने के साथ ही निर्धारित समय पर बाजार में भी उपलब्ध  है। बस अब समय है कि कम से कम खाद्यान्न का उपयोग करे। नरम गरम बनाकर खांए। साथ ही गांव में वस्तु विनिमय एंव उधार जैसी व्यवस्था का उपयोग कर इस समय को गुजारा जा सकता है। इसके अलावा सक्षम परिवारों को चाहिए कि वे कोरोना के खिलाफ इस महायज्ञ में आहुति देते हुए मदद की शुरूआत सर्वप्रथम अपने घर से ही करे । यदि इस जंग में जीतना है,तो अपने घर में खाद्यान्न का कम से कम उपयोग कर अपने पडोसी,परिचित,रिश्तेदारांे की मदद करना होगी।

क्योकि प्रत्येक व्यक्ति के सर्कल में गरीब-अमीर सभी तरह के परिवार रहते है। तो आज समय है इस सम्पन्नता और निर्धनता की खाई का पाटने का। देश का प्रत्येक नागरीक अपने विवेक से काम ले और पुर्ण इमानदारी के साथ लाकडाउन का पालन करते हुए जल्द से जल्द इस जंग को जीतने में अपना सहयोग करे। सभी सुखी रहै,सभी निरोगी रहै,किसी का किसी प्रकार का दुःख ना हो और ईश्वर सभी के दुःख हर ले।